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Monday, May 28, 2012
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संघर्ष
धर्म-अधर्म की लड़ाई ले रही थी अंगड़ाई, दूर बैठे हंस रहे थे बाबू ले रहे थे जम्हाई। हौसले कभी टूटते नही जब मन से तैयारी होती,...
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दूसरों की खुशियों पे दुःख जताने वालों, आसमां की तरह छत चाहाने वालों, क्यों तिनके तिनके पे, इस कदर जलते हो, जब जलना ही है त...
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मैं अपने ही घर में कैद हूँ मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए रोती बिलखती सर पटकती रही मैं अब मेरी आवाज को एक आवाज चाह िए जी रही हूँ कड़वे घूँट...
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जन जन से मिल कर शहर से निकल कर आती है सहमी सी आवाज की तुम मुझे बचालो! मुझे बचालो ! मुझे बचालो ! हर एक पहाड़ से टकराकर ...

3 comments:
अलग अलग विधाओं के माध्यम से आपका अनूठा प्रयोग देखते ही बनता है। आपकी इस ग़ज़ल से दिल को सकून सा मिला है। आभार !
कैंसे यकीं करें खुद पर हम,
जब इन्सान को इन्सान खा रहा है ........सच लिखा है आपने...
सही कहा इन्सान को इन्सान खा रहा है .. बहुत मार्मिक रचना
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