Wednesday, February 13, 2013

विकाश कु उजालू


या विकाश की जोत

कै निर्भागिन जैगा होली

भुलाक अपनों की पीड़ा

विरानो मा माया घोली !

जख जख तक यी आँखी

देख्नु कु जांदी

देखिक ये विकाश तै

खौल्ये सी रह जांदी

देखा यूँ दानी आँखियों माँ

क्या – क्या आज छूप्यून च

दौह्ल सी फुकेंनी जुकड़ी

प्राण मुछालू बन्युं च !  गीत - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'















विजयदशमी

ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...