धर्म-अधर्म की लड़ाई
ले रही थी अंगड़ाई,
दूर बैठे हंस रहे थे
बाबू ले रहे थे जम्हाई।
हौसले कभी टूटते नही
जब मन से तैयारी होती,
जो खुद को सबसे ऊपर समझते
आत्मानएँ अक्सर उनकी रोती।
दानवीर और क्षमावीर क्यों,
चुपचाप यूँ छुपे पडे थे,
क्या बिगाड़ेगा कॉकरोच
सोच कर यूँ अडींग खड़े थे।
देखा हिलता सिंघासन
अचानक यूँ प्रकट हुये
सुलह हुई साम्राज्य की
आँसू खुद के गटक लिए। @ - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
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