Monday, October 15, 2012

देश को बचाना है


है सौगंध तुम्हें भारत माँ की,
इस माटी पर उपकार करो,
लाज बचानी है माँ की अब 
तो संसद के उस पार चलो !

लोकतंत्र की अस्मत का देखो,
कैंसे चीथड़े-चिथड़े कर डाले हैं,
जनसंख्या दिखती नहीं उतनी,
जितने हर शहर में घोटाले हैं ! ....रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' 



संघर्ष

धर्म-अधर्म की लड़ाई ले रही थी अंगड़ाई, दूर बैठे हंस रहे थे बाबू ले रहे थे जम्हाई। हौसले कभी टूटते नही जब मन से तैयारी होती,...