Wednesday, February 10, 2016

घर

मैं  निकल पडा हूँ, घर की तलाश में ! 
जहाँ बूढी अम्मा,
एक नई पीढ़ी को,
गाथाएँ सुनती हुई मिले l

मैं  निकल पडा हूँ,
घर की तलाश में ! 
जहाँ पर गूँज रही हो किलकारियाँ,
और महकता हुआ आँगन मिले l 

मैं  निकल पडा हूँ, 
घर की तलाश में ! 
जहाँ पर दीवारें गुनगुनाती हों,
मिट्टी के सौन्दर्य की कहानी, 
और एहसास न हो चार दिवारी का l  @ - रचना , सर्वाधिकार सुरक्षित, राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

विजयदशमी

ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...