Sunday, September 28, 2014

कोई भीख लेता है कोई भीख मांगता है, 
है भिखारी कौन ये कोई नहीं जनता, 
कोई महलों से फैलाता है हाथ अपना,
बटोरते हैं कोई चौराह से सपना 
फर्क बस रंग का है दोस्तों 
कोई काले कलूटे फटे बस्त्र समेटे 
कोई लहराता गेरुवा और खाकी भेष में 
देखो सूरमाओं का छुपा चेहरा मेरे देश में 
कोई भीख लेता है कोई भीख मांगता है, 
है भिखारी कौन ये कोई नहीं जनता l -रचना @ राजेंद्र सिंह कंवर 'फरियादी'

विजयदशमी

ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...