जन जन से मिल कर
शहर से निकल कर
आती है सहमी सी आवाज
की तुम मुझे बचालो!
मुझे बचालो !
मुझे बचालो !
हर एक पहाड़ से टकराकर
हर एक नदी से नहा कर
धरती को चीर कर
हवा सी घसीट कर
आती है सहमी सी आवाज
की तुम मुझे बचालो!
मुझे बचालो !
मुझे बचालो !
माँ की ममता से
किसान की क्षमता से
व्यवसायी के व्यवसाय से
युवा के उत्साह से
थक हार कर
आती है सहमी सी आवाज
की तुम मुझे बचालो!
मुझे बचालो !
मुझे बचालो !
सूर्य की किरण से
धरती के रज-कण से
नेताओं के आवाहन से
इन्सान के संज्ञान से
आती है सहमी सी आवाज
की तुम मुझे बचालो!
मुझे बचालो !
मुझे बचालो !
विज्ञानं के चमत्कार से
ज्योतिष के उपकार से
दानी के दान से
विद्वान के ज्ञान से
थक हार कर
आती है सहमी सी आवाज
की तुम मुझे बचालो!
मुझे बचालो !
मुझे बचालो !........राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
15 comments:
जिंदगी की भागम भाग के बीच अभी कुछ फुर्सत मिली तो आपके ब्लॉग तक पहुंचा. आपने बिखरे शब्दों को एक आयाम दिया है जिसकी गूँज बहुत दूर तक सुनाई देती होगी.... एक से बढ़कर एक बेहतरीन कवितायेँ.... आगे नियमित पढूंगा तो लिख पाऊँगा. ... अनेकानेक शुभकामनायें !!
Apne blog se "Word verification" jaroor hataiye.
BAHUT SUNDER KUNWER JI
bahut badhiya...
bahut sundar rajendra ji....
namaskar ...bahut hi sunder abhivyakti ......hindi ki pukar .dharti ki vyatha ko bhi khibsurti se piroya hai aapne ..........badhai .
happy new year ...!
mere blog par aapka swagat hai ....... dhanyavad .
सभी मित्रों का आभार आशा है आपका मधुर स्नेह मिलता रहेगा
bahut sunder rachnai...... badhai.
Waah Bahut Sunder
वाह बहुत उम्दा प्रस्तुति! बधाई हो....
अब शायद 3-4 दिन किसी भी ब्लॉग पर आना न हो पाये!
उत्तराखण्ड सरकार में दायित्व पाने के लिए भाग-दौड़ में लगा हूँ!
बृहस्पतिवार-शुक्रवार को दिल्ली में ही रहूँगा!
खरगोश का संगीत राग रागेश्री
पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों
में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध
लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है,
पर हमने इसमें अंत में पंचम
का प्रयोग भी किया है, जिससे
इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
..
हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
.. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती है.
..
Feel free to visit my web site ... संगीत
एक से बढकर एक बेहतरीन रचनाएँ जो समाज को, व्यवस्था को और आस-पास के परिवेश को झकझोरती, पूछती तथा समाधान करती हुयी प्रतीत होती हैं बहुत-बहुत बधाई !
"लावारिश लाश "
आज सुबह नींद
जल्दी खुल गई
अलसाते हुए
सैर करने को
निकल पड़ा...
अभी कुछ ही..
दूर चला था
कि.....
हमारे घर के
पीछे की गली वाले
शर्मा जी..
अपने शाल में...
मुंह छुपाये
एक दुकान के फ़ट्टे
पर बैठे कपकपा
रहे थे....हमने
पास जाकर
कारण पूछा...
....तो पहले
वह सकपकाए
फिर...
आँखों से गुर्राए
मेरे ज्यादा कुरेदने पर
उनके आँसू निकल आये
वह पोंछते हुए बोले
कहाँ जा रहे हो
इतने सवेरे-सवेरे
मैंने कहा.....
सैर करने
घर में मन नहीं लगा
घर वह इतनी जोर से बोले
कि.....मैं गया डर
वह उठे और
मेरे साथ हो लिए
मेरे मन में
कुछ शंका उठी
मैंने पूछा....
झिझकते हुए
शर्मा जी...क्या
क्या आपके साथ
है कोई घटना घटी
उन्होंने पहले मुझसे
ये वादा लिया
किसी से न कहने का
और फिर फट पड़े
पानी भरे बदल सा
कहते हुए कि......
मैंने अपने पुरखों कि
आखरी निशानी इस
पांच कमरों के घर को
अपने पाँचों बेटे को
पत्नी के कहने पर
इनकी शादी के बाद
एक-एक कमरा बाँट दिया
ताकि घर न बिके...
हम मिलकर रह सकें
ले...कि..न.....
उसके जाने के बाद
घर छोटा है....
इसे बेचो की....
जिद के विरोध में
जब में अड़ा.....तो
मुझे ही घर से बाहर का
मुंह है देखना पड़ा
मैं सोचता हूँ
क्या मैं ही अकेला
ऐसा बदनसीब हूँ
या मेरी तरह.....
कोई और भी है
अब मैं यह देखने
हूँ निकल पड़ा
अगर कोई मिले
तो शायद उसे...
देखकर मेरा
दर्द कम हो जाये
कहते हुए....
जाते देखा था
आखिरी बार.....
बीस बरस पहले
फिर मैंने....
क्या...किसी ने भी
उन्हें कभी नहीं देखा
पर आज उसी जगह
उसी तरह......
फिर कोई सोया है
मैं कदम आगे
बढ़ाता हूँ....यह देखने को
कि कहीं ये शर्मा जी
तो नहीं......
लेकिन.....अचानक
सोचता हूँ
अस्सी बरस के शर्मा जी
आज बीस साल बाद
कैसे हो सकते हैं
मैं बिन देखे ही
लौट आता हूँ
और घंटे भर बाद मेरी
पत्नी नाश्ते पर
मुझे बताती है कि...
अभी - अभी पता चला है
धोबिन के द्वारा
बीस साल पहले
जो शर्माजी कहीं चले गए थे
वह आज गली के बाहर
मरे मिले हैं....
मैंने उत्सुकतावश पूछा..
तुम्हे कैसे पता...कि..
वह शर्माजी ही हैं
उसने कहा उनके पास
एक डायरी मिली है
जिसमे सब लिखा है
अगले दिन
अख़बार में एक इश्तेहार
छपा था फोटो के साथ
शर्माजी का नाम पता
उम्र,कद के साथ परिचय
कि उसके वारिश
सात दिनों के अन्दर
उसे अंतिम क्रिया
के लिए ले जाएँ वर्ना
पुलिस लावारिश
समझकर उसका अंतिम
संस्कार कर देगी
सातवें दिन एक
मोची का लड़का
उस अख़बार के
विज्ञपन के साथ
सभी मोहल्ले वालों को
संग लेकर पुलिस थाने
लाश को लेने पहुँच जाता है
इस हक़ के साथ कि
मैं इनका छात्र हूँ
यह लावारिश नहीं है
मैं इनका......
अंतिम संस्कार करूँगा
मुझमें इनके दिए ही संस्कार हैं
जो मैं इन्हें अब अर्पित करूँगा
अंतिम संस्कार और अस्थियाँ
गंगा में प्रवाहित कर
छात्र तो उकृण हो गया
लेकिन उन बेटों का क्या
जिनका जो ऋण था
जो चुका न पाए
क्या कभी उकृण हो पाएंगे
यह सवाल मैं अपनी पत्नी से
पूछता हूँ....तो वह लम्बी साँस
छोड़ते हुए कहती है अच्छा है
भगवान ने हमें बे-औलाद रखा है
वर्ना हमें घर के होते हुए
सड़क पर मरना पड़ता
चलो लावारिश लाश होने से तो बचे...
....हुकम चन्द भास्कर
26092012
सुन्दर प्रस्तुति बधाई। मंजुल भटनागर
राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रति समर्पित भाव। सराहनीय अभिव्यक्ति।
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