मन भ्रमित हैं सब के अब
आँखें झील सी लहराती
इक बेचारी राजनीति से
लड़खड़ाते भारतवासी
राम रहीम का देश था ये
शांति ही इसकी लाठी थी
दूसरों की खुशियों पे कुर्वानी
ऐंसी मेरे देश की थी माटी .........रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
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विजयदशमी
ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...
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दूसरों की खुशियों पे दुःख जताने वालों, आसमां की तरह छत चाहाने वालों, क्यों तिनके तिनके पे, इस कदर जलते हो, जब जलना ही है त...
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मैं अपने ही घर में कैद हूँ मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए रोती बिलखती सर पटकती रही मैं अब मेरी आवाज को एक आवाज चाह िए जी रही हूँ कड़वे घूँट...
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जन जन से मिल कर शहर से निकल कर आती है सहमी सी आवाज की तुम मुझे बचालो! मुझे बचालो ! मुझे बचालो ! हर एक पहाड़ से टकराकर ...
2 comments:
बढ़िया प्रस्तुति | आपकी कई रचनाएं पढ़ीं |
भावपूर्ण ।।
अच्छा लगा ये ब्लॉग ....बाकी पोस्ट भी पढूंगी ' राम रहीम का देश था ये शान्ति ही इसकी लाठी थी '
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