जगाता रहा
समय का चाबुक
जन जन को !
निगाहों पर
तश्वीरों के निसान
उभर आते !
सोई आँखों में
सपने बनकर
बिचरते हैं !
संकेत देते
बढ़ते कदमो को
संभलने का !
इंसानी तन
लिप्त था लालसा में
नजरें फेरे !
संभले कैंसे
रफ़्तार पगों की
बेखबर दौड़े ! रचना – राजेन्द्र सिंह कुँवर
‘फरियादी’
1 comment:
समय चक्र जीवन का आधार है
आपकी रचना ने इसे अनुभूति भी दे दी है
सुंदर रचना बधाई
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