Thursday, July 3, 2014

मेरे कदमो की आहाट से अब उनको डर लगने लगा,
जो कभी मेरे इन्तजार में आँखें बिछाए रहते थे l 
वही अब दिन-रात बेचैन रहते हैं अपने सपनों से ,
जो कभी छुपाये अपने ख्वाबों में हमें रहते थे l @ राजेंद्र सिंह कुँवर 'फरियादी' 

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विजयदशमी

ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...