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संघर्ष
धर्म-अधर्म की लड़ाई ले रही थी अंगड़ाई, दूर बैठे हंस रहे थे बाबू ले रहे थे जम्हाई। हौसले कभी टूटते नही जब मन से तैयारी होती,...
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दूसरों की खुशियों पे दुःख जताने वालों, आसमां की तरह छत चाहाने वालों, क्यों तिनके तिनके पे, इस कदर जलते हो, जब जलना ही है त...
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मैं अपने ही घर में कैद हूँ मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए रोती बिलखती सर पटकती रही मैं अब मेरी आवाज को एक आवाज चाह िए जी रही हूँ कड़वे घूँट...
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जन जन से मिल कर शहर से निकल कर आती है सहमी सी आवाज की तुम मुझे बचालो! मुझे बचालो ! मुझे बचालो ! हर एक पहाड़ से टकराकर ...

4 comments:
कभी पत्थर से पूछा उसे कितना दर्द हुआ होगा जब तराशा गया
भला भगवान पर भगवान को क्यों कर चढ़ाऊँ मैं...!
फूल टहनी पर ही अच्छे लगते हैं ...... वे जो पौधे लगाते हैं उन्हें ये अहसास होता है .
पर औरों को नहीं
संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित रचना ........
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