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संघर्ष
धर्म-अधर्म की लड़ाई ले रही थी अंगड़ाई, दूर बैठे हंस रहे थे बाबू ले रहे थे जम्हाई। हौसले कभी टूटते नही जब मन से तैयारी होती,...
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मेरा देश कहाँ जा रहा है। आँखें खोल के देखो। सी यू ई टी ( CUET) के रूप में सरकार का यह बहुत बड़ा नकारा कदम साबित होने वाला है। इस निर्णय के र...
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दूसरों की खुशियों पे दुःख जताने वालों, आसमां की तरह छत चाहाने वालों, क्यों तिनके तिनके पे, इस कदर जलते हो, जब जलना ही है त...
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मैं अपने ही घर में कैद हूँ मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए रोती बिलखती सर पटकती रही मैं अब मेरी आवाज को एक आवाज चाह िए जी रही हूँ कड़वे घूँट...

4 comments:
कभी पत्थर से पूछा उसे कितना दर्द हुआ होगा जब तराशा गया
भला भगवान पर भगवान को क्यों कर चढ़ाऊँ मैं...!
फूल टहनी पर ही अच्छे लगते हैं ...... वे जो पौधे लगाते हैं उन्हें ये अहसास होता है .
पर औरों को नहीं
संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित रचना ........
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