Wednesday, October 10, 2012

फूल को तोड़ लेते

निर्जीव पत्थर को हम , 

देव मानते चले हैं अपना, 

मुस्कराते फूल तोड़ कर, 

रोज करते है एक गुनाह !..........रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'


गौं घौर गुठ्यारों मा आज भी डाळयोँ कु छैल पसरयूँ च! सरकी च आफु आपरी खुट्टीयोंन् यू मंख्यों कु दोष च मंखि हरच्युं च! पोथ्लियों कु चुंच्य...