Monday, August 1, 2011

ये आँखे तो दर्पण हैं

ये आँखे तो दर्पण हैं 
अधर पर जो न आ पाये
इन पर हर रोज़ उभरता है 
मन का मौसम कैंसा भी हो 
इन पर सब कुछ दिखता है 
ये आँखे तो .........ये आँखे तो ....
ये आँखे तो दर्पण हैं !
खुशियाँ भी फुहवारे बन कर 
गम आते हैं लेकर रिमझिम 
अक्स इन पर ऐंसे उभरते 
जैंसे मानो हो प्रतिबिंम्ब 
ये आँखे तो ......... ये आँखे तो ........
ये आँखे तो दर्पण हैं !.......रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

आँखि खोल द्या बक्त ऐगी देख्णो आँखि खोल द्या बक्त ऐगी बोनो  भट्याकी बोल द्या अदलि बदलि देख्ला कब तैं अब त बटोल द्या! बक्त ऐगी देख्णो आ...