ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है,
भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है।
दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं,
काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं।
राम ने वन काटा, पर धीरज न छोड़ा,
मर्यादा में रहकर ही, हर बंधन तोड़ा।
आज न पुतला जले, अहंकार जलाओ,
सीता सी निष्ठा मन में फिर से बसाओ।
जो दूसरों की हार में अपनी जीत गिने,
वो दशहरा क्या समझे, क्या दीप जले?
सच्ची विजय वही, जो खुद पर पाई जाए,
मन में राम बसे तो, दशा ही बदल जाए। @ - राजेन्द्र सिंह कुँवर ‘फरियादी’