कोई प्रशंसा करे या निंदा दोनों ही स्थिति में जीवन के मूल्य का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि प्रशंसा प्रेरणा देती है और निंदा सावधान होने का अवसर प्रदान करती है।
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विजयदशमी
ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...
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दूसरों की खुशियों पे दुःख जताने वालों, आसमां की तरह छत चाहाने वालों, क्यों तिनके तिनके पे, इस कदर जलते हो, जब जलना ही है त...
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मैं अपने ही घर में कैद हूँ मुझे अपनों से ही आजादी चाहिए रोती बिलखती सर पटकती रही मैं अब मेरी आवाज को एक आवाज चाह िए जी रही हूँ कड़वे घूँट...
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जन जन से मिल कर शहर से निकल कर आती है सहमी सी आवाज की तुम मुझे बचालो! मुझे बचालो ! मुझे बचालो ! हर एक पहाड़ से टकराकर ...

3 comments:
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (10-01-2021) को ♦बगिया भरी बबूलों से♦ (चर्चा अंक-3942) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--हार्दिक मंगल कामनाओं के साथ-
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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सार्थक विचार।
Nice article. Thank you for sharing.
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