मुख्या पृष्ट

Tuesday, February 9, 2016

घर

मैं  निकल पडा हूँ, घर की तलाश में ! 
जहाँ बूढी अम्मा,
एक नई पीढ़ी को,
गाथाएँ सुनती हुई मिले l

मैं  निकल पडा हूँ,
घर की तलाश में ! 
जहाँ पर गूँज रही हो किलकारियाँ,
और महकता हुआ आँगन मिले l 

मैं  निकल पडा हूँ, 
घर की तलाश में ! 
जहाँ पर दीवारें गुनगुनाती हों,
मिट्टी के सौन्दर्य की कहानी, 
और एहसास न हो चार दिवारी का l  @ - रचना , सर्वाधिकार सुरक्षित, राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

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