Friday, August 31, 2012

मैं पत्थर ही सही

मैं पत्थर ही सही पर,

पुत्र हिमालय का हूँ !

मुझ पर नजरें लाखों की थी,

मैं तो निशाना कुछ नज़रों का हूँ !

मुझे लूटने कितने आये,

हर एक ने शीश नवाया !

लहू दिया सब ने अपना,

व्यर्थ में जीवन अपना गवाया ! .....रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'






गीली मिट्टी कभी आंखों में नव अंकुर सी रेखांकित कर देती  पल-पल को गीली मिट्टी! सपने पलने लगते अपने चलने लगते एहसास दिला जाती क्षण भर म...