Friday, January 20, 2012

मतदाता

मत दाता तू कब समझेगा 
अंगूठे की आपनी ताकत को
सबसे प्यारा खेल है ये 
इस खेल की नजाकत को !
भूले विसरे आ जाते हैं 
झुण्ड बनाकर गली -गली में 
चहरे इनके खिल उठाते हैं 
फूल -फूल में कली-कली में !
नाम पे किसी के मत जाना 
झोली में किसी की क्या रखा है 
अंगूठे को अपने ये समझना 
कोई किसी का सगा नहीं है !
न पार्टी किसी की अपनी होती 
कुर्सी का ही खेल है सारा 
उस पर मिटते ये 'फिरौती' !
तन मन धन लूट के ये 
कुर्सी के गुणगान करते 
थे कभी तुम्हारी ही 'रज'
आज तुम्हारे भगवन बनते !! ............रचना राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

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