Wednesday, December 18, 2019

बड़ा नही हूँ

बड़ा नही हूँ
हक भी नही है
बड़ा होने का!
अपनों के बीच
अपनों में रहना
अद्भुत अंदाज है
अपना होने का!
चौक खड़ियाँ वो सिलेटें
कब छोड़ दी, नही जानता
हाँ तेरे आने से
कुछ बदला है कद
मेरे छोटे होने का।
पानी धूप और हवा ने
कभी आवाज नही दी
जैंसे तुम दे रहे हो
कुछ अलग होने का।
क्या चाहते हो
अब यूँ जल कर
धूप खिला पाओगे
एक टाँग पर खड़े होकर
क्या एहसास है होने का। @ - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'








1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (19-12-2019) को      "इक चाय मिल जाए"   चर्चा - 3554    पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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