Wednesday, December 14, 2016

गाँव बुढा हो चला है क्यों लौट रहे हो बर्षों बाद आँखों में आँसू लिए किसको ढूंढ रहे हो। गाँव बुढा हो चला है तुम भी घुटनों पर उठ कर गिर रहे हो, फिर आज यूँ क्यों लड़खड़ाते हुये कदम वापस बढ़ा रहे हो। गाँव बुढा हो चला है वो भूल चुका है तुम्हें तुम भी भूल चुके थे किसके लिए तुम पत्थर रख हृदय में यूँ वापस आ रहे हो। गाँव बुढा हो चला है अशिक्षित है मगर अपनी मातृभाषा को पहिचानता है तुम तो विदेशी भाषाओँ के बादशाह बन बैठे थे फिर क्यों लौट आये। @ - सर्वाधिकार सुरक्षित, राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

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विजयदशमी

ढाल तलवार नहीं, मन को उठाना है, भीतर जो रावण है, पहले उसे हराना है। दस मुख नहीं, दस विकार हम ढोते हैं, काम, क्रोध, लोभ में हर रोज खोते हैं। ...