मुख्या पृष्ट

Tuesday, August 12, 2014

भूल कर मातृभाषा को हम
देश भक्त बनते जा रहे हैं l 
समेट रहे हैं पश्चिम को हर ओर 
और तिरंगा खुद का लहरा रहे हैं l 
लेटी हुई है शय्या पर भाषा और 
हम हिंदी के गुण गा रहे हैं l 
लेकर अग्नि हम हाथों में 
हिंदी को रोज जला रहे हैं l 
भूल कर मातृभाषा को हम
देश भक्त बनते जा रहे हैं l 
है नहीं कोई रक्षक दल अपना
जो गौरव से अपनी भाषा बोले 
देखो दाग रहे हैं सीमा से 
अपनी भाषा पर  ही वो गोले l 
भूल कर मातृभाषा को हम
देश भक्त बनते जा रहे हैं l 
समेत रहे हैं पश्चिम को हर ओर 
और तिरंगा खुद का लहरा रहे हैं l - रचना सर्वाधिकार सुरक्षित राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी;'